Bangladesh Condom Crisis:
बांग्लादेश में ‘साइलेंट क्राइसिस’: कंडोम के दाम 700 टका के पार, क्या फटने वाला है जनसंख्या बम?
Bangladesh Condom Crisis: बांग्लादेश इन दिनों सिर्फ सड़कों पर मची हिंसा या राजनीतिक उठापटक से ही नहीं जूझ रहा, बल्कि एक ऐसा ‘खामोश संकट’ दस्तक दे रहा है जो आने वाली पीढ़ियों की किस्मत बदल सकता है. देश में कंडोम और गर्भनिरोधक (Contraceptives) साधनों का अकाल पड़ गया है. हालात इतने खराब हैं कि जो पैकेट कभी चंद रुपयों में मिलता था, अब उसकी ब्लैक मार्केटिंग और आसमान छूती कीमतों ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है.
बाजार से क्यों गायब हुए गर्भनिरोधक?
बांग्लादेश अपनी जरूरतों के लिए विदेशी आयात (Import) पर निर्भर है. लेकिन हालिया हिंसा और सप्लाई चेन टूटने की वजह से विदेशी खेप समय पर नहीं पहुंच पाई. रही-सही कसर परिवार नियोजन निदेशालय (DGFP) के सिस्टम ने पूरी कर दी. फंड की कमी और कानूनी पेचीदगियों की वजह से नई खरीद ठप पड़ी है.
आंकड़े जो होश उड़ा देंगे
नेशनल कॉन्ट्रासेप्टिव समरी रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले 6 सालों में सप्लाई चेन की हालत पतली हुई है:
कंडोम की सप्लाई: 57% की भारी गिरावट.
ओरल पिल्स: उपलब्धता 63% तक कम हुई.
स्टॉक की स्थिति: 11 दिसंबर 2025 तक देश के पास महज 39 दिनों का कंडोम स्टॉक बचा था.
700 टका तक पहुंची कीमत: गरीब और मध्यम वर्ग बेहाल
जब सरकारी सप्लाई रुकती है, तो कालाबाजारी शुरू हो जाती है. ढाका और अन्य शहरों के मेडिकल स्टोर्स पर कंडोम की कीमतें बेतहाशा बढ़ गई हैं:
लोकल ब्रांड: 15-25 टका से बढ़कर 50 टका तक पहुंच गए.
प्रीमियम ब्रांड: जो कभी 250 टका में मिलते थे, अब 300 से 700 टका के बीच ब्लैक में बिक रहे हैं.
एक्सपर्ट की चेतावनी: विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अगले 30 दिनों में सप्लाई बहाल नहीं हुई, तो देश में अनचाहे गर्भ (Unwanted Pregnancy) और मातृ मृत्यु दर के मामलों में भयानक उछाल आ सकता है.
सिस्टम की नाकामी: कोर्ट कचहरी में फंसी फाइलें
DGFP के डायरेक्टर अब्दुर रज्जाक के अनुसार, दवाओं की खरीद से जुड़ा एक मामला अदालत में है, जिससे नई टेंडर प्रक्रिया रुकी हुई है. साथ ही, फील्ड वर्कर्स की भारी कमी ने गांवों तक पहुंचने वाली मदद को पूरी तरह काट दिया है.
निष्कर्ष: Bangladesh Condom Crisis बांग्लादेश के लिए यह सिर्फ एक मेडिकल किल्लत नहीं, बल्कि एक बड़ा सामाजिक संकट है. अगर समय रहते सरकार ने दखल नहीं दिया, तो दशकों की मेहनत से हासिल किया गया ‘जनसंख्या नियंत्रण’ का लक्ष्य ताश के पत्तों की तरह ढह सकता है.
अस्वीकरण: इस लेख में दी गई जानकारी रिपोर्टों और सार्वजनिक आंकड़ों पर आधारित है. यह लेख किसी भी प्रकार की राजनीतिक वैमनस्यता फैलाने के लिए नहीं, बल्कि केवल सूचनात्मक उद्देश्यों (Educational Purposes) के लिए लिखा गया है.